ठोकर खाना मुहावरे का अर्थ thokar khana muhavare ka arth – क्षति सहना या पिडा सहना ।
ठोकर खाना मुहावरे का अर्थ क्या होता है?
दोस्त ठोकर खाना मुहावरे का अर्थ क्षति सहना या पिडा सहना ।होता है । यानि दोस्त,
| मुहावरा | अर्थ |
| ठोकर खाना | क्षति सहना या पिडा सहना । |

ठोकर खाना मुहावरे को कैसे समझे
दोस्तो आज के इस संसार मे हर किसी को अपना जीवन जिने के लिए पैसो की जरूरत हो गई । जिसके कारण हर कोई पैसे कमाने के लिए अलग अलग कार्य करता है । इस तरह से कार्य करने के बाद भी कभी कभी ऐसा समय आ जाता है जब किसी को हानि या क्षति सहनी पड जाती है और क्षति तभी सही जाती है जब उसकी कोई क्षति हो जाती है । इस तरह से जब किसी को क्षति सहनी पड जाती है या फिर क्षति होने के कारण आई पिडा को सहना पड जाता है तब इस मुहावरे का प्रयोग किया जाता है । इस तरह से इस मुहावरे का अर्थ क्षति सहने के अलावा कष्ट सहना भी होता है ।
ठोकर खाना मुहावरे का वाक्य मे प्रयोग
जब तक नोकरी नही मिल जाती तब तक ठोकर खाता फिरूगा और कोई चारा नही है ।
ठोकर खा कर हर कोई अपने आप को अच्छी तरह से जान लेता है ।
माता पिता के मर जाने के कारण राजेश स्वयं ही ठोकर खाता हुआ इतना बडा हो गया ।


अगर साथ बुरा हो तो धनवान को भी ठोकर खानी पड जाती है ।
घर से निकल जाने के कारण महेश को दर दर की ठोकर खानी पड रही है ।


तुम जैसे घमण्डी को जब तक दुनिया भर की ठोकर खानी नही पड जाती तुम्हे पैसो की अहमीयत पता नही चल सकती है ।
मैं दुनिया भर की ठोकर खा चुका हूं मुझे मत समझाओ की वह कैसा है और तुम कैसे हो ।
प्रताब पर भरोषा कर कर मैं घर छोडकर आ गया पर अब मुझे ठोकरें खानी पड रही है ।
ठोकर खाना मुहावरे पर कहानी
प्राचिन समय की बात है राजेन्द्र नाम का एक आदमी हुआ करता था । उसके घर मे उसके माता पिता के अलावा और कोई भी नही रहता था । राजेन्द्र के माता पिता के पास बहुत धन दोलत थी । वे गाव के सबसे धनवान लोग थे इस कारण से गाव के लोग भी उन्हे समान दिया करते थे और उन्हे माना भी करते थे ।
साथ ही जब भी कोई काम होता तो गाव के लोग राजेन्द्र के पिता के पास आकर उनसे पूछते की वह काम कैसा रहेगा कर ले क्या । इस तरह से राजेन्द्र के पिता की गाव मे बात चलती थी । राजेन्द्र के गाव मे उस समय कोई भी नही पडता था ।
साथ ही राजेन्द्र के गाव मे कोई विधालय भी नही था । इस कारण से राजेन्द्र के साथ साथ उसके गाव के लोग भी पढे लिखे नही थे । एक बार की बात है राजेन्द्र के माता पिता कही जा रहे थे तो जाते समय रास्ते मे उन पर डाकूओ ने हमला बोल दिया जिसके कारण से वे दोनो वहां से भागने लगे थे ।
तब उन डाकूओ मे से एक डाकू ने उन पर गोली चला दी जिसके कारण उसे उन दोनो की मृत्यु हो गई थी । जब इस बारे मे राजेन्द्र को पता चला तो उसे बहुत दुख पहुंचा पर वह कर क्या सकता था ।
इस कारण से उसने किसी तरह से अपने आप को संभाला और उनके शरीर का अंतिम संस्कार किया । माता पिता के मर जाने के कारण से वह कई दिनो तक तो सदमे मे रहा फिर गाव मे इधर उधर जाने लगा था ।
उस बुरे समय मे वह कुछ ऐसे लोगो के साथ हो गया था जो बुरा काम करते थे । कहने का अर्थ है की वे लोग दारू जुआ बाजी और भी न जाने क्या क्या करते थे । उन लोगो मे से एक प्रताब था । जो बहुत ही बुरा आदमी था ।
गाव के लोगो को भी उसके बारे मे पता था की वह गाव का सबसे बुरा आदमी है । इस कारण से कोई भी उसके साथ रहना नही चाहता था ।ऐसे मे राजेंद्र उसके साथ रहने लगा था । जब गाव के लोगो को इस बारे मे पता चला तो गाव के लोगो ने कहा की उसका साथ छोड दो वरना वह तुम्हे ठोकरे खुआ कर छोडेगा ।
उस समय राजेंद्र को गाव के लोगो की बात समझ मे नही आई और वह उसके साथ ही रहता था । वे दोनो इतने नजदिक हो गए थे की राजेंद्र ने उसे अपने घर मे रहने को कह दिया था । धिरे धिरे प्रताब उसके साथ इस तरह से घुल मिल गया जिसके कारण से राजेंद्र ने उसे अपने पैसो के बारे मे बता दिया की वह पैसे यहां पर रखता है ।
इस कारण से प्रताब पैसे लेकर जाने की फिराक मे था फिर उसने सोचा की अगर यह गाव के लोगो से पैसे उधार ले लेगा तो मैं वह भी उससे चुरा लूगा । ऐसा सोच कर प्रताब ने एक दिन राजेंद्र से कहा की दोस्त मुझे पैसो की जरूरत है ।
तब राजेन्द्र ने कहा की कितने चाहिए मेरे पास है मैं तुम्हे दे दुगा । ऐसा सुन कर प्रताब ने कहा की नही दोस्त मैं तुम्हारे पास से नही लूगा अगर तुम गाव के लोगो से लेकर दो तो मैं ले लूगा ।
इस तरह से प्रताब ने उसे मना लिया जिसके कारण से राजेंद्र ने गाव के लोगो से पैसे उधार लेकर उसे दे दिया था । पैसे मिल जाने के कारण उसी रात को प्रताब उठ कर राजेंद्र के पैसे भी चुरा कर वहां से फरारा हो गया था ।
जब सुबह राजेंद्र को जाग आई तो उसने देखा की प्रताब उसके पास नही है और साथ ही उसकी तिजोरी मे पैसे नही है । ऐसा देख कर राजेंद्र को पता चल गाया की वह मेरे पैसे लूटर कर भाग गया है ।
जब इस बारे मे गाव के लोगो को पता चला तो गाव के लोगो ने राजेंद्र से पैसे मागने शुरू कर दिए थे । जिसके कारण राजेंद्र को अपना घर बार बेचना पड गया था । फिर पैसे उतरने का नाम नही ले रहे थे । घर बार बिक जाने के कारण राजेंद्र अब गाव की गलियो मे रहने लगा था ।
क्योकी पैसे अभी तक गाव के सभी लोगो को नही मिले थे । इस कारण से जब भी वह किसी को दिखता तो वह उससे पैसे देने को कहता था । पर उसके पास अब खाने को दाना नही था इस कारण से वह पैसे कहा से दे सकता है ।
जब राजेन्द्र को इस हालत मे कोई देखता तो वे आपस मे बाते करने लग जाते की यह पहले धनवान था पर बुरी संगती मे पडने के कारण आज इसे ठोकरें खानी पड रही है ।
इस तरह से जब राजेन्द्र का सब कुछ चला गया तो उस पर दुखो का पहाड पड गया था और उसे पिडा सहनी पडने लगी थी । इस तरह से आप लोगो को समझ मे आ गया होगा की इस मुहावरे का अर्थ पिडा सहना या क्षति सहना होता है ।
ठोकर खाना मुहावरे पर निबंध || essay on idioms in Hindi
जीवन में अगर आप क्षति सहते हरेगे और पिड़ा सहते रहेगे तो आपका जीवन कभी भी इन परेशानी से आजाद नही होगा । क्योकी हमेशा जो पिड़ा होती है उसका सामना करना होता है और अगर आप सामना करेगे तो आप एक समय पर ऐसे स्थान पर पहुंच जाएगे जहां पर आपको पिड़ा सहनी नही पड़ेगी ।
जिस तरह से ठोकर लगने पर क्षति होती है या कहे की पिड़ा का सामना करना पड़ता है उसी तरह से इस मुहावरे का अर्थ भी क्षति सहना या पिडा सहना होता है ।
वैसे अगर पूरे लेख को पढा गया है तो इस बात को आप अच्छी तरह से समझ गए है की किस तरह से ठोकर खाना मुहावरे का अर्थ क्षति सहना या पिडा सहना होता है । इसके बाद में आपको यह समझने में जरा सी देर नही लगने वाली है की इस मुहावरे का वाक्य में प्रयोग वही पर होगा जहां पर क्षति सहना या पिडा सहने की बात होती है ।