कंठ (गला) भर आना मुहावरे का अर्थ kanth bhar aana muhavare ka arth – भावुक होकर बोल न पाना ।
कंठ (गला) भर आना मुहावरे का अर्थ क्या होता है?
दोस्त कंठ (गला) भर आना मुहावरे का अर्थ भावुक होकर बोल न पाना होता है । यानि दोस्त,
| मुहावरा | अर्थ |
| कंठ (गला) भर आना | भावुक होकर बोल न पाना |

कंठ (गला) भर आना मुहावरे को कैसे समझे
दोस्तो मनुष्य जीवन में अनेक तरह की क्रिया होती रहती है । जिसमें वह अपने आप में तरह तरह के बदलाव देखता है । उसी तरह से जब किसी व्यक्ति के सामने कुछ इस तरह की बात कह दी जाती है जो उसके साथ न होने पर भी उसे ऐसा लगे की यह मेरे साथ ही हो रहा है । जैसे अगर किसी के ऐसे व्यक्ति के साने दुख की बात की जाए जो व्यक्ति स्वयं दुखी होता है तो इस तरह की दुख की बात सुन कर वह व्यक्ति भी दुखी हो जाता है ।
और वह इतना अधिक दुखी हो जाता है की वह कुछ नही कह सकता है । क्योकी वह बात सुन कर भावुक होकर बोल नही पाता है । तो इस तरह से जब कोई व्यक्ति भावुक होकर बोल नही पाता है तो इसे कंठ (गला) भरना कहा जाता है । क्योकी जब किसी व्यक्ति के कंठ (गला) भरे होते है तो वह कुछ भी बोल नही पाता है ।
कंठ (गला) भर आना मुहावरे के अन्य रूप
दोस्तो इस मुहावरे को अलग अलग जगहो पर अलग अलग नाम से जाना जाता है जो है –
| मुहावरा | अर्थ |
| गला भर आना- | भावुक होकर बोल न पाना |
| कंठ भरना- | भावुक होकर बोल न पाना |
| गला भरना | भावुक होकर बोल न पाना |
गला भर आना-
कंठ भरना-
गला भरना आदी ।
मगर इन सभी का अर्थ एक ही होता है जो है – भावुक होकर बोल न पाना ।
कंठ (गला) भर आना मुहावरे का वाक्य में प्रयोग

- रामलाल का दुख सुन कर हर किसी के कंठ (गला) भर आते है ।
कंठ (गला) भर आना मुहावरे पर कहानी
दोस्तो प्राचीन समय की बात है एक बार एक साधू हुआ करता था । जिसका काम केवल लोगो को ज्ञान बाटने का होता था । हालाकी वह साधू लोगो के कष्टो को दूर करने के लिए ज्ञान की बाते भी बताता था । मगर इस संसार में ऐसा कोन नही है जिसके पास दूख नही होते है ।
मगर यह कोई नही सोचता था और बिना कुछ समझते हुए उस गाव के लोग साधू को अपने दुखो के बारे में बताते और और अधिक दूखी हो जाते थे । तब साधू उन लोगो को केवल एक ही बात कहता की इस संसार में अगर आपने जन्म लिया है तो आपको दूखो का सामना तो करना ही होगा । इस तरह से कह कर सभी लोग साधू से कहते की महाराज आप अपने जीवन में घर गृस्थी में नही हो तभी ऐसी बाते कर रहे हो वरना आपके जीवन में भी दुख होते तो आप ऐसी बाते नही करते ।
मगर साधू इसका जबाब किसी को नही देता था । यह सब देख कर साधू के चेलो को बडा दूख होता था । क्योकी वे नही चाहते थे की साधू महाराज को लोग ऐसा वैसा कहे । मगर लोगो का क्या था वे तो अपनी ही बात को देखते थे बल्की किसी दुसरे के बारे में यह तक नही सोचते थे की उनके जीवन में क्या चल रहा है ।
मगर कहते है की समय का चक्र ऐसा होता है जो की किसी छीपी हुई बात को भी लोगो के सामने लाकर रख देता है । और ऐसा ही कुछ साधू और उसके गाव के लोगो के साथ हो गया था । क्योकी साधू जो था वह इतने अधिक कष्टो में था की अगर इस बारे में लोगो को पता चलता तो लोगो के आसू नही थम पाते थे ।
मगर साधू लोगो को अपने लिए दूखी नही देखना चाहता था । जिसके कारण से इन दुखो के बारे में किसी को नही बताता था । मगर साधू के इन दूखो के बारे में उसके चले जानते थे । मगर साधू ने उन्हे भी मना कर रखा था की वह किसी को यह नही बताए की साधू दूखी है । हालाकी एक बार इस बारे में सभी को मालूम चल ही गया था ।
दरसल एक बार उसी गाव में प्रवचन थे और वहां पर साधू महाराज को बुलाया था । मगर साधू आज तक किसी भी तरह के प्रोग्राम में नही जाता था और न ही वहा पर जाकर प्रवचन देता था । मगर इस बार साधू के साथ ऐसा नही हुआ । क्योकी गाव का हर आदमी साधू महाराज से विनती करने लगा था की वह प्रोग्राम में सामिल हो और अपने शुभ प्रवचन से लोगो के कष्टो को दूर करने का प्रयास करे ।
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मगर फिर भी साधू बार बार मना कर रहा था । मगर लोग भी साधू की बात नही मान रहे थे और जीद कर कर साधू महाराज के सामने पूरे एक दिन रात बैठे रहे । जिसके कारण से साधू ने लोगो की बात मान ली । जब यह प्रोग्राम शुरू हुआ तो साधू महाराज वहां पर आए । मगर साधू महाराज एक सुदंर सी खुर्सी पर बैठ कर आए थे । जिसे उसके चेलो ने पकड रखा था ।
जब लोगो ने ऐसे आने का कारण पूछा तो साधू ने कहा की मैं जब भी अपने मठ से बाहर जाता हूं । तो ऐसे ही जाता हूं । यह सुन कर लोगो की संका मिट गई । मगर कुछ लोग ऐसे भी थे जो की अपने दिल में संका कर बैठे की साधू महाराज ऐसे ही क्यो आते है । तब उन लोगो ने इस बारे में पता लगाने की कोशिश की । मगर साधू ने कुछ नही बताया ।
जिसके कारण से कुछ लोगो के दिमाग की बत्ती जल गई और वे संका करने लगे की साधू ऐसे ही क्यो आते है । तभी प्रवचन शुरू हो गए । जिसमें साधू ने खुब अच्छे प्रवचन देने शुरू किए । जब प्रवचन का समय समाप्त हुआ तो गाव का हर नागरीक अपने दूखो को साधू को कहने लगा । जिसे सुन कर साधू को दूख होता और उन लोगो को दूख दूर करने के बारे में कुछ कहता ।
मगर एक बात तो जरूर कहता की इस संसार में जो भी आता है वह जरूर देखता है । मगर तभी लोग कहते की महाराज आपके जीवन में तो किसी तरह का दूख नही है । यह सुन कर साधू मुस्कुराता और कुछ नही बोलता था । मगर यह सब सुन कर साधू के चेले दूखी होते थे । क्योकी उन्हे मालूम था की साधू के जीवन में क्या क्या है ।
मगर साधू के कारण से वे इस बात को किसी को नही बताते थे । मगर उसी प्रोग्राम के अंत के समय में एक व्यक्ति ने साधू को इतना अधिक भला बूरा कह दिया । जिसे सुन कर साधू के चेले बोल पडे की आप लोग अपने दूखो को साधू को बताते रहते हो । मगर साधू के जीवन में क्या है इतना सुनते ही साधू ने चेले को चुप करा दिया ।
मगर तभी दूसरा आदमी बोल पडा की इस साधू के जीवन में क्या हो सकता है यह तो बडे मजे से अपना जीवन गुजार रहा है । भला साधू के जीवन में क्या होगा । न तो साधू के बेटे है और न ही पत्नी है। जिसके कारण से किसी तरह के दूख नही हो सकते है । यह सुन कर साधू के चेले ने कहा की साधू के पैर नही है, साधू की आंखे नही है इसके अलावा साधू के शरीर में कैंसर है ।
भला इतना दूख काफी है या साधू के बारे में और कुछ जानना है । यह सब सुन कर लोग हैरान रह गए । तभी साधू का दूसरा चेला बोल पडा की साधू के पैर न होने के कारण से रात को बहुत ही दर्द होता है और कैंसर होने के कारण से अक्सर साधू को खून की उल्टी होती रहती है । और कुछ भी न देखने के कारण से जब अकेले रहते है तो कुछ नही कर पाते है ।
यह सुन कर गाव के लोगो के कंठ (गला) भर आए और कुछ न बोल पा रहे थे। क्योकी इतने दुख तो गाव के किसी भी व्यक्ति के पास नही थे । और वे अपने जीवन में दूख दूख करते रहते थे । मगर साधू के दुख के बारे में जान कर लोगो को भी काफी दूख पहुंचा ।
तब साधू के चेले ने कहा की यह तो संसार का नियम है की जीस व्यक्ति के जीवन में दुख है उन्हे भौगना ही पडता है । तो इससे दूखी होने की जरूरत नही । क्योकी साधू ईश्वर भग्त है तो यह जानते है की यह सब सृष्टी का नियम है । और यही कारण है की साधू हमेशा कहते है की दूखो तो सहना ही पडता है ।
यह सब जान कर लोग एक दम चुप हो गए । जिसे देख कर साधू का दुसरा चेला बोल पडा की अब क्या आपके कंठ (गला) भर आए है जो कुछ नही बोल रहे हो । तभी साधू बोला की तुम दोनो चुप रहो । मैं नही चाहता था की यह सब गाव के लोगो को पता हो । क्योकी लोग यह सुन कर और अधिक दूखी हो जाएगी ।

तभी गाव के लोग साधू महाराज से माफी मागते हुए वहां से जाने लगे थे । साधू के दुखो के बारे में गाव के लोगो को पता चलने का नतीजा यह हुआ की लोग फिर कभी भी साधू के सामने अपने दूखो को नही रखते थे । इस तरह से साधू का जीवन और गाव के लोगो का जीवन था ।
इस तरह से आप इस कहानी से मुहावरे का अर्थ समझे होगे ।
कंठ (गला) भर आना मुहावरे पर निबंध
दोस्तो जब आप पानी पीते है तो वह पानी आपके मुंह से फिर कंठ (गला) में प्रवेश करता है । जिसे गला भी कहा जाता है । और इस तरह से जब पानी गले में होता है तो आप कुछ नही बोल पाते है । क्योकी ऐसी स्थिती में आवाज नही निकलती है। क्योकी आपके कंठ (गला) भरे हुए है ।
उसी तरह से आप जब किसी के दुखो और कष्टो के बारे में जानते है तो दूखी हो जाते है और ऐसी स्थिती में सामने वाले को क्या कहे यह आपको नही समझ में आता है । और ऐसी स्थिती में आपके कंठ (गला) से आवाज नही निकती है ।
क्योकी कंठ (गला) में पानी होना और भावूक होने के कारण से कंठ (गला) से आवाज का न निकलने का कारण एक ही जैसा होता है । तो कंठ (गला) भर आना मुहावरे का अर्थ भावुक होकर बोल न पाना होता है ।
इसे इस तरह से भी समझा जा सकता है । की जब आप भावुक होते है तो कुछ बोलना तो चाहते है जो की सामने वाले को अच्छा लगे । मगर फिर भी आपके कंठ (गला) से किसी तरह की वाणी बाहर नही आती है। क्योकी आप सामने वाले की बात को सून कर आप भावुक हो जाते हो और ऐसी स्थिती में कंठ (गला) भर आना कहा जाता है।
अत: कंठ (गला) भर आना मुहावरे का अर्थ भावुक होकर बोल न पाना होता है ।
इस तरह से आपको यह मुहावरा समझ में आ गया होगा ।