हाथों हाथ लेना मुहावरे का अर्थ hathon hath lena muhavare ka arth – तुरंत लेना या बहुत अधिक स्वागत–सत्कार करना ।
हाथों हाथ लेना मुहावरे का अर्थ क्या होता है?
दोस्त हाथों हाथ लेना मुहावरे का अर्थ हाथों हाथ लेना – तुरंत लेना या बहुत अधिक स्वागत–सत्कार करना होता है । यानि दोस्त,
| मुहावरा | अर्थ |
| हाथों हाथ लेना | हाथों हाथ लेना – तुरंत लेना या बहुत अधिक स्वागत–सत्कार करना । |

हाथों हाथ लेना मुहावरे को कैसे समझे
दोस्तो कहा जाता है की घर आया हुआ हर कोई हमारा मेहमान होता है और मेहमान का स्वागत करना हमार कर्तव्य है । जिससे हम सभी का स्वागत सत्कार करते है । और वे जो कहते है वह तुरन्त मान लेते है । साथ ही वे कुछ देते है तो तुरन्त ले लेते है । इस तरह से तुरन्त लेना और स्वागत सत्कार करने को ही हाथों हाथ लेना कहा जाता है ।
हाथों हाथ लेना मुहावरे का वाक्य में प्रयोग hatho hath lena muhavare ka vakya me prayo
जब श्री कृष्ण जी अर्जुन के पास गए तो अर्जुन ने कृष्ण जी को हाथों हाथ लिया ।
राजवीर जैसे सच्चे और नेक व्यक्ति को हर कोई हाथों हाथ लेता है ।

गाव मे आए बाबाजी को देख कर बाबाजी को गांववासियों ने हाथों हाथ लिया ।
घर आए भिक्षा मांगने वाले को किशोर ने घर बेठाकर भोजन करवाया और उसका खुब स्वागत किया जैसे मानो की हाथों हाथ ले लिया हो ।
राजा के पास जो भी चला जाता है वह उन्हे हाथो हाथ लेकर उसकी अच्छी सेवा करता है ।

सुरेखा जैसी और कही नही मिलेगी क्योकी जो भी कोई उसके घर जाती है वह उसका स्वागत बडे ही तोर तरीको से करती है जैसे मानो की वह हाथों हाथ ले रही हो ।
ब्रहमण के घर जब राजा विक्रमादित्य गए तो ब्राहमण ने उन्हे हाथों हाथ लिया और अपनी कुटिया मैं बैठा कर भोजन भी करवाया ।

हाथो हाथ लेना मुहावरे पर कहानी hathon hath lena muhavare par kahani
प्राचिन समय की बात है किसी नगर मे एक ब्राहमण रहा करता था । ब्राहमण बडाही चतुर था वह किसी को भी अपने घर मे आते देख कर उसके सबसे पहले पैर धुलवाता और फिर उसे अंदर बुला कर खाना खिलवाता था । अगर उसका दुश्मन भी उसके पास चला जाता तो वह उसके साथ भी ऐसा ही करता था जिसके कारण से उसका नगर मे कोई दुश्मन नही रहा ।
ब्राहमण के पास धन की कमी थी जिसके कारण से वह पकवान तो नही खा सकता था मगर आराम से अपना पेट भर लेता और फिर भी दो लोगो के खाने के लिए बच जाए ऐसा उसके घर में भोजन मिल ही जाता था । यानि वह केवल रोटिया खा कर ही काम चलता था । इतना गरीब होने के बाद में जब लोग उसके इस आदर समान को देखते तो उन्हे बडा ही अच्छा लगता ।
ब्राहमण के इस तरह के विचार धारा के कारण से उसका नाम आस पास के गावो मे भी हो रहा था । जिसके कारण से ही एक दिन पास के गाव का सेठ ब्राहमण के पास जाकर पता लगाना चाहता था की आखिर वह सच मे ऐसा है की लोग अफवाह उडा रहे हे । वह सेठ भी बडा दयालू था जिसके कारण से वह इस तरह के दयालू और सच्चे दिल वाले लोगो की मदद करना चहता था ।
इसी के चलते सेठ एक दिन गरीब का भेष बना कर उस ब्राहमण के नगर की और चला गया । जब ब्राहमण की कुटिया आई तो सेठ ने गाव के लोगो से ब्राहमण का घर पुछा । तब गाव के लोगो ने कहा की जो सामने छोटी सी कुटिया दिख रही है वही उस महान ब्राहमण का घर है ।
यह देख कर सेठ दग रह गया क्योकी जो लोगो को कभी खाली पेट अपने घर से नही जाने देता है वह एक छोटी सी कुटिया मे रहता है । यह देख कर सेठ को बडा ही अच्छा लगा । जिसके कारण से सेठ भी उसके घर मे जाकर भोजन करने की सोचने लगा था । जब सेठ ब्राहमण की कुटिया के पास गया तो ब्राहमण ने उसे आते देख लिया ।
जिसके कारण से ब्राहमण उसके सामने जाकर उसके सबसे पहले पैर धुलवाए और फिर उसे आराम से अंदर बुला लिया । यह देख कर सेठ सोच रहा था की ब्राहमण तो हर किसी का आदर कर रहा है मुझ जैसे गरीब दिखने वाले का भी यह इतनी अच्छी तरह से आदर कर रहा है । जब सेठ अंदर चला गया तो ब्राहमण अपने झोपडे मे रखे एक बहुत ही पुराने मटके से पानी लाकर उसे पीला दिया ।
फिर ब्राहमण ने सेठ से बात की कुछ समय बितने के बाद जब सेठ वहा से जाने लगा तब ब्राहमण ने कहा की आप अभी नही जा सकते मेरी पत्नी पास की झोपडी मे खाना बना रही है वह खा कर ही आपको जाना होगा । इस तरह से कहने पर सेठ ने कहा की नही भाई मैं खाना नही खा सकता । यह सुन कर ब्राहमण ने कहा की क्यो नही यह आपका ही घर है ।
आज जब हमारे घर में आ ही गए हो तो हमे आपकी पूरी सेवा करनी होगी । इस तरह से कह कर ब्राहमण ने सेठ को अपनी झोपडी में डाट लिया और जब खाना बन गया तो उसे पकडा दिया । तब सेठ खाना खाने लगा तो उसे खाना बडा ही स्वादिष्ट लगा । तब सेठ ने ब्राहमण से कहा की आपके घर का खाना खा कर मजा आ गया ।
साथ ही सेठ ने ब्राहमण को न्यूता देते हुए कहा की आपको भी मेरे घर मे आना होगा और दो समय का भोजन कर कर ही जाना होगा । तब ही मैं मानुगा की आपने मेरी पूरी सेवा की थी । यह सुन कर ब्राहमण ने कहा की आपका गाव दूर है मैं केसे आ पाउगा । यह सुन कर सेठ ने कहा की मुझे नही पता आपको मेरे घर मे आना ही होगा ।
इस तरह से कहने के बाद मे सेठ वहा से चला जाता है । इस बात को समय बितते हुए तीन दिन हो जाते है मगर अभी तक सेठ के घर ब्राहमण नही पहुंचा था । साथ ही ब्राहमण ने सेठ को उसके घर जाने का वचन दे दिया था । जिसके कारण से वह भी जाने का समय देख रहा था । की एक दिन उसे पता चला की पास के गाव मे एक बैलगाडी जा रही है ।
यह सुन कर ब्राहमण उस बैलगाडी मे बैठ गया और सेठ के घर चला गया । मगर सेठ का घर उसे दिख नही रहा था क्योकी वह गरीब लग रहा था और जो सेठ ने स्थान बताया वहा एक महल ही था । यह देख कर ब्राहमण वहा से वापस जाने लगा था । तभी सेठ ने उसे देखा और वह महल से दोडा दोडा आया और ब्राहमण के पास आकर कहा की क्या हुआ भाई काफी समय बाद आए हों ।
इस बात का ब्राहमण ने कोई उत्तर नही दिया था बल्की वह सोच रहा था की आखिर यह महल मे कैसे है क्या महल इसका है तभी ब्राहमण ने सोचा की यह यहां पर काम करता होगा । जब सेठ उसे महल मे ले जा रहा था तब ब्राहमण ने कहा की यह महल आपका है क्या । यह सुन कर कर सेठ ने कहा की हां यह मेरा महल है और मैं गरीब नही हूं बल्की मैं इस महल का मालिक और बहुत अमिर हूं ।
यह सुन कर ब्राहमण ने कहा की उस दिन तो तुम गरीब थे । तब सेठ ने कहा की नही उस दिन भी मैं अमीर था मगर तुम्हारे बारे मे जानने के लिए मैंने गरीब का नाटक किया था । यह सुन कर ब्राहमण ने कहा की आपने मुझसे झूठ बोला था इस कारण से मैं अब आपके साथ महल मे नही जाउगा । ऐसा सुन कर सेठ ने कहा नही जब मैं आपके पास आया था तो आपने हाथों हाथ ले लिया । और जब आप मेरे घर आए हो तो मैं भी हाथों हाथ लेकर आपकी खुब सेवा करूगा ।
ऐसा कह कर सेठ ने उसे महल मे ले गया । महल मे ले जाने के बाद मे सेठ ने उसका बडी अच्छी तरह से आदर सत्कार किया । और जब भोजन का समय हुआ तो उसे 56 भोग का भोजन खिलाया । अब जब ब्राहमण के जाने का समय हुआ तो वह जाने वाला ही था की सेठ ने उसे एक पोटली दी और कहा की इसमे तुम्हारे लिए कुछ है जो तुम अपने घर जाकर ही खोलोगे ।
सेठ के ऐसा कहने पर वह सोचने लगा की आखिर इसमे क्या होगा । मगर सेठ ने ब्राहमण से वादा ले लिया । जिसके कारण से ब्राहमण जब अपने घर पहुंचा तब ही उस पोटली को अपनी पत्नी के सामने खला । पोटली खुलने पर ब्राहमण को बहुत हिरे जेवरात दिखाए दिए । साथ ही एक पत्र भी मिला जिसमे लिखा था की भाई यह मेरी तरफ से तुम्हारे लिए एक तोफा है जो तुम्हारे नेक विचार है यह सब उसका ही लेना है ।
मगर ब्राहमण को यह अच्छा नही लगा तभी उसे दुसरा पत्र मिला जिसमे लिखा था की तुमने मुझे हाथों हाथ लेकर खुब सेवा की थी तो जब तुम मेरे घर पर आते हो तो मैं तुम्हारी सेवा कैसे नही करूगा । साथ ही लिखा था की यह सब वापस लेकर मत आ जाना क्योकी अब मैं इस गाव में नही हुं बल्की दूसरे शहर जा रहा हूं।
साथ ही यह सब तुम्हारा ही है इस तरह से फिर ब्राहमण की पत्नी ने कहा की उन्होने आपकी इसी तरह से सेवा की है । इस कारण से यह आपका ही होगा । अपनी पत्नी के ऐसा कहने पर ब्राहमण मान गया और उस धन को अपने पास रख लिया । मगर वह धन ब्राहमण अपने लिए नही रखा था बल्की जो भी कोई उसके पास आता उसकी वह खूब अच्छी तरह से सेवा करता था ब्राहमण का जीवन इसी तरह से चलता रहा । इस तरह से आपको इस कहानी से मुहावरे का अर्थ समझ मे आ गया होगा ।
हाथों हाथ लेना मुहावरे का पर निबंध || essay on idioms in Hindi
दोस्तो आपको पता है की अगर हम किसी काम को समय पर करते है तो यह सही रहता है और इसका काफी फायदा भी होता है ।
और यही कारण है की हमारे पीढी के जो लोग है वे कहते है की काम को तुरंत कर लेना चाहिए । मगर आपको हाथों हाथ लेने के मुहावरे के बारे मे जानना है तो इसका मतलब भी इसी तरह से तुरंत करने के बारे मे होता है ।
दरसल मुहावरा जो होता है वह असल में तुरंत लेना या बहुत अधिक स्वागत-सत्कार करने के अर्थ को दर्शाता है और यह सब आपने कहानी के माध्यम से पढा होगा । और इस बात के कारण से मैं कह सकता हूं की आपने इस मुहावरे को पूरी तरह से समझ लिया है ।
अगर आप अभी भी इस मुहावरे को नही समझ पाए है तो आपको बात दे की इसे समझने के लिए आपको लेख को ध्यान से पढना चाहिए । वैसे आप कमेंट मे जो पूछना चाहते है वह पूछ सकते है। आपको समय पर उत्तर दिया जाएगा ।
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